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राहुल गांधी के भाषणों की भाषा मोदी की ताकत बन रही है
Posted By- Mahesh kumar Updated: 2/12/2019 11:24:46 PM

राहुल गांधी पिछले एक हफ्ते से बदली हुई भाषा बोल रहे हैं. यह भाषा उनके राजनीतिक विरोधी नरेंद्र मोदी की है. इसमें पर्याप्त बदज़ुबानी है. नादानी तो खैर राहुल के पास पहले से ही पर्याप्त थी. उसमें अब कुछ इजाफा हो गया है. दिक्कत यह है कि मंच से जब आप तू-तड़ाक, सीने की नाप और तमाम परिचित थिऐट्रिक्स पेश करने लगते हैं, तो आपमें और आपके विरोधी में बहुत कम फर्क रह जाता है. गाय के चलते मनुष्यों पर मध्य प्रदेश में रासुका लगा कर आपकी पार्टी यह साबित करने से भी नहीं चूकी कि दरअसल बीजेपी से आप अलग नहीं हैं. तो सवाल उठता है कि राहुल गांधी में यह बदलाव और बौखलाहट कहॉं से और क्यों कर आई? जवाब दृश्य पर ही है. इसे ग़ौर से पढ़ने की दरकार है. राहुल तीन फरवरी को पटना में रैली करते हैं. बढ़िया आयोजन, भाषण वगैरह होता है. न्यूजरूम में पीएम मोदी पर राहुल के अटैक वाले पैकेज दनादन बनने लगते हैं. टीवी पर कई पैकेज शाम तक समां बांध देते हैं. फिर अखबारों के पहले पन्ने पर सजने की बारी आती है. लेकिन तभी सीबीआई बनाम ममता बनर्जी का मामला शुरू हो जाता है. राहुल पर बने तमाम पैकेज स्क्रीन से हटने लगते हैं. अखबारों में राहुल पहले पेज से पिछड़कर अंदर के पेजों पर शिफ्ट कर दिए जाते हैं. सब तेज़-ताप दीदी यानी ममता बनर्जी हर लेती हैं.  चुनाव में कम दिन रह गए हैं. हिंदी हार्ट लैंड की एक मेगा रैली कुछ घंटों की सनसनी बनकर खत्म हो गई. पीएम पद की विपक्षी दावेदारी में ममता बनर्जी रातों-रात गजब के गर्जन-तर्जन से सबसे ऊपर पहुंच गईं. उनके रौद्र से धरनातुर केजरीवाल तक सहम गए. मायावती, अखिलेश, चंद्रबाबू, कुमारस्वामी मन मसोसकर ही सही, दीदी की जय बोल पड़े. सुबह अखबारों में मुकाबला मोदी बनाम राहुल नहीं, ममता बनाम मोदी बन गया. जिस टीएमसी और उनकी मुखिया को राहुल बंगाल में कुछ बरस पहले चिट फंड घोटालों के लिए पानी पी-पीकर कोस आए थे, उन्हें मोदी विरोध में मजबूरन बहादुरी और समर्थन के नोट लिख कर भेजने पड़े.

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